अर्थशास्त्र का अर्थ : अर्थशास्त्र वह शास्त्र है जिसमे उन आर्थिक क्रियाओ का अध्ययन किया जाता है जिससे व्यक्ति सीमित साधनो का प्रयोग करके अपनी असीमित आवश्यकताओ की पूर्ति करता है ।
व्यष्टि अर्थशास्त्र : आर्थिक सिद्धांत का वह भाग जो अर्थव्यवस्था की व्यक्तिगत आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करता है | जैसे : उपभोक्ता व्यवहार , उत्पादक व्यवहार , बाज़ार व कीमत निर्धारण है |
आर्थिक समस्या का अर्थ : अर्थव्यवस्था मे उपलब्ध सीमित साधनो से असीमित आवश्यकताओ की पूर्ति किस प्रकार की जाए ये आर्थिक समस्या कहलाती है ।
आर्थिक समस्या उत्पन होने के कारण :
1. सीमित साधन
2. असीमित आवश्यकताए
3. साधनो के वैकल्पिक प्रयोग
दुर्लभता का क्या अर्थ है । दुर्लभता ही सभी समस्याओ का कारण है । इस कथन की व्याख्या करो ।
अथवा
दुर्लभता की समस्या चयन की समस्या को किस प्रकार उत्पन्न करती है । व्याख्या करो ।
दुर्लभता की समस्या का अर्थ : सभी अर्थव्यवस्था चाहे वह वे भारत की तरह अल्पविकसित हो या अमेरिका की तरह विकसित , सभी पास उत्पादन साधन सीमित है । जबकि उनकी आवश्यकता असीमित है । अर्थव्यवस्था मे उपलब्ध उत्पादन साधनो , जैसे - भूमि , श्रम, पूंजी , उद्धम जैसे साधनो की मांग जकी तुलना मे पूर्ती का सीमीत होना दुर्लभता कहलाती है ।
दुर्लभता की समस्या का अर्थ : सभी अर्थव्यवस्था चाहे वह वे भारत की तरह अल्पविकसित हो या अमेरिका की तरह विकसित , सभी पास उत्पादन साधन सीमित है । जबकि उनकी आवश्यकता असीमित है । अर्थव्यवस्था मे उपलब्ध उत्पादन साधनो , जैसे - भूमि , श्रम, पूंजी , उद्धम जैसे साधनो की मांग जकी तुलना मे पूर्ती का सीमीत होना दुर्लभता कहलाती है ।
दुर्लभता= साधनो की मांग > साधनो की पूर्ति
दुर्लभता व गरीबी समानार्थी नही है : दुर्लभता व गरीबी दोनो समान नही है । गरीबी का अभिप्राय जीवन के लिये आवश्यक आधारभूत वस्तुओ जैसे - भोजन , कपडा , आवास का ना होना है । इनकी न्युनतम प्राप्ती के पश्चात निर्धनता दूर हो जाती है । जबकी दुर्लभता उत्पादन साधनो की मांग की तुलना मे साधनो की पूर्ती की सीमितता को दर्षाता है । अतः दुर्लभता और निर्धनता समान नही है ।
संसाधनो के आबंटन की समस्या तथा अर्थव्यवस्था कि केन्द्रीय समस्या :- अर्थव्यवस्था मे उपलब्ध सभी साधन दुर्लभ है । इनकी दुर्लभता के कारण असीमित आवश्यकताओ मे से अति आवश्यक का चुनाव करना पडता है । अतः अर्थव्यवस्था मे उपलब्ध सीमित साधनो से किन आवश्यकताओ को पहले पूरा किया जाए ये चयन की समस्या कहलाती है ।
संसाधनो के आबंटन की समस्या के प्रकार तथा अर्थव्यवस्था कि केन्द्रीय समस्या :-
1. उत्पादन क्या किया जाए
2. उत्पादन कैसे किया जाए
3. उत्पादन किसके लिये किया जाए
1. उत्पादन क्या किया जाए : अर्थव्यवस्था की पहली और प्रमुख केन्द्रीय समस्या होती है की उत्पादन क्या किया जाए तथा उत्पादित वस्तु की मात्रा कितनी होनी चाहिए ।
अर्थव्यवस्था को निम्न वस्तुओ मे से चुनाव करना पडता है -
(A). उपभोक्ता वस्तुए : ये वे वस्तुए होती है जो मनुष्य कि आवश्यकताओ की प्रत्यक्ष रूप से संतुष्टी करती है ।
जैसे : अनाज , कपडे आदि
अर्थव्यवस्था को निम्न वस्तुओ मे से चुनाव करना पडता है -
(A). उपभोक्ता वस्तुए : ये वे वस्तुए होती है जो मनुष्य कि आवश्यकताओ की प्रत्यक्ष रूप से संतुष्टी करती है ।
जैसे : अनाज , कपडे आदि
(B). पूंजीगत वस्तुए : ये वे वस्तु होती है जिनसे अन्य वस्तुओ का उत्पादन किया जाता है ।ये मनुष्य कि आवश्यकताओ की अप्रत्यक्ष रूप से संतुष्टी करती है ।
जैसे : मशीन , औजार , यंत्र , परिवहन के साधन
(C). युद्धकालिन वस्तुए : वे वस्तुए जो अर्थव्यवस्था मे सुरक्षा व कानून व्यवस्था के लिये आवश्यक होते है उन्हें युद्धकालिन वस्तुए कह्ते है ।
जैसे : हथियार , टैंकर , मिसाइले आदि
2. उत्पादन कैसे किया जाए : अर्थव्यवस्था की यह केन्द्रिय समस्या उत्पादन संबंधी तकनीक के चुनाव की समस्या होती है । उत्पादन तकनीक निम्न दो प्रकार की होती है -
(A). श्रम प्रधान तकनीक : किसी वस्तु के उत्पादन की वह तकनीक जिसमे पूंजी की अपेक्षा श्रम का अधिक प्रयोग किय जाता है , श्रम प्रधान तकनीक कहते है । यह सरल श्रम उत्पादन तकनीक होती है ।
(B). पूंजी प्रधान तकनीक : किसी वस्तु के उत्पादन की वह तकनीक जिसमे श्रम की अपेक्षा पूंजी का अधिक प्रयोग किया जाता है उसे पूंजी प्रधान तकनीक कहते है । यह जटिल उत्पादन तकनीक होती है ।
3. उत्पादन किसके लिए किया जाए : यह केन्द्रिय समस्या राष्ट्रीय आय के वितरण की समस्या होती है | इसके
अंर्तगत इस केंद्रीय समस्या का सामना करना पड़ता है की राष्ट्रीय आय को उत्पादन के प्रमुख
साधनों में लगान ,मजदूरी , ब्याज , लाभ आदि के रूप में किस प्रकार बाटा जाए |
उत्पादन उन व्यक्तियों के लिए किया जाता है जो वस्तुओ को क्रय करते है और यह क्रय शक्ति राष्ट्रीय आय के वितरण पर निर्भर करती है | यदि एक बार यह निर्धारण हो जाता है की राष्ट्रीय आय का वितरण किस प्रकार करना है तो इसका निर्णय आसानी से लिया जा सकता है की उत्पादन क्या किया जाए |
बाज़ार अर्थव्यवस्था या पूंजीवाद : पूंजीवाद का अभिप्राय उस आर्थिक प्रणाली से होता है , जिसमें उत्पादन के सभी साधनों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है | और उत्पादन क्रियाएं निजी लाभ के उद्देश्य से संपन्न की जाती है | सरकार आर्थिक क्रियाओ में कोई हस्तक्षेप नही करती इसलिए इसे मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्था कहते है | तथा इसमें केंद्रीय समस्याओं का समाधान कीमत तंत्र की सहायता से किया जाता है |
पूँजीवाद की विशेषताए :
- निजी सम्पति का अधिकार : बाज़ार अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषता निंजी संपत्ति का अधिकार है | इसमें लोगो को निजी संपत्ति रखने और इच्छानुसार प्रयोग करने की पूर्ण अधिकार होता है |और सरकार भी लोगो के अधिकार की रक्षा करती है |
- कीमत संयंत्र : बाज़ार अर्थव्यवस्था में कीमत संयंत्र एक समन्वयकारी भूमिका निभाता है | कीमत संयंत्र ही उत्पादकों और उपभोक्ता का मार्गदर्शन करता है |सभी वस्तुओ और साधनों की सेवाओ की कीमतों का निर्धारण स्वतंत्र रूप से मांग और पूर्तियो के शक्तियो के संतुलन द्वारा निर्धारित होना कीमत संयंत्र कहलाता है |


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